देशी बीजों के प्रसार से लाभ
बीज अकाल की संभावना के बारे में सुनकर, ओडिशा के सीमांत किसान सुदाम साहू ने देशी बीजों का संरक्षण शुरू कर दिया और अब वह उन बीजों के साथ जैविक खेती के चैंपियन हैं।
बीज अकाल की संभावना के बारे में सुनकर, ओडिशा के सीमांत किसान सुदाम साहू ने देशी बीजों का संरक्षण शुरू कर दिया और अब वह उन बीजों के साथ जैविक खेती के चैंपियन हैं।
लगातार दो साल फसल खराब होने के बाद, मंगलु साहू दो एकड़ से 44 क्विंटल धान की फसल लेकर खुश हैं।
ओडिशा के बारगढ़ जिले के यह सीमांत किसान, अपने बचाव के लिए स्थानीय ‘बीज तारणहार’ सुदाम साहू की तारीफ़ करते हैं।
कृतज्ञतापूर्वक मंगलू साहू कहते हैं – “मैं पहले से ही कर्ज में डूबा हुआ था, मेरे पास अगले मौसम के लिए बीज खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। लेकिन सुदाम साहू मेरी सहायता के लिए आगे आए। उन्होंने मुझे एक ज्यादा उपज देने वाली स्थानीय किस्म ‘ताल्मुली’ के बीज मुफ़्त में दिए।”
मंगलु साहू जैसे उसी जिले के सैकड़ों किसान हैं, जो मार्गदर्शन और मदद के लिए सुदाम साहू की ओर देखते हैं।
लेकिन यह बीज रक्षक कौन है?
कांटापाली गांव के रहने वाले सुदाम साहू भी एक सीमांत किसान हैं, लेकिन जो देशी बीज का संरक्षण करते हैं। साहू न केवल स्वदेशी बीजों का संरक्षण करते हैं, बल्कि दूसरों को भी उन बीजों से फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
एक किसान परिवार से संबंध रखने वाले, सुदाम अपनी 2 एकड़ जमीन पर काम करने में अपने दादा की मदद करते थे, जिसमें से एक एकड़ उनके पिता के इलाज के लिए गिरवी रखी गई थी।
जब उनके पिता की तबीयत बिगड़ी, तो सुदाम ने खेत पर काम करने के लिए स्कूल का अपना अंतिम वर्ष छोड़ दिया।
सुदाम साहू याद करते हैं – “मैंने खेती अपने दादा से सीखी। वह दो देशी किस्मों के साथ जैविक खेती किया करते थे।”
“वर्ष 1999 में मैंने संबलपुर के एक कार्यकर्ता और पूर्व सांसद किशन पटनायक का भाषण सुना। उन्होंने समझाया कि कैसे आधुनिक तकनीक स्वदेशी खेती को ख़त्म कर रही है और कहा कि एक दिन बीज संकट पैदा हो जाएगा, जिसे उन्होंने ‘बीज अकाल’ कहा।”
पटनायक के भाषण से प्रेरित होकर, साहू ने देशी बीजों के संरक्षण को अपना मकसद बना लिया। उन्होंने अपने दादा की मदद से देशी बीजों को संरक्षित करने का फैसला किया, जो पारम्परिक ज्ञान के एक भंडार थे।
वह इस नए जुनून के प्रति इतने समर्पित थे, कि साहू ने एक सरकारी नौकरी की पेशकश को भी ठुकरा दिया, ताकि वे खेती जारी रख सकें और बीजों का संरक्षण कर सकें।
गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन के बारे में और जानने के लिए, उन्होंने किसानों के साथ काम कर रहे गैर-लाभकारी संगठनों के एक समूह द्वारा आयोजित प्रशिक्षणों में भाग लिया।
शुरू में उन्होंने गांवों के दौरे किए और इच्छुक किसानों को एक या दो किस्में दीं। उन्होंने उनसे खेती की और फिर बीज दूसरे किसान को दिए और उन्होंने फिर आगे और यह सिलसिला चलता रहा।
प्रगति की धीमी गति को महसूस करते हुए, और निरंतर जैविक बीज संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए, उन्होंने महाराष्ट्र के वर्धा में गांधी आश्रम के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया और ‘अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र’ में एक सत्र में भी भाग लिया।
अपने दादा की धान की दो किस्मों से शुरू करके, साहू ने धीरे-धीरे और ज्यादा बीज इकठ्ठा किए।
जब भी वे कहीं जाते थे, वहां के स्वदेशी बीज ले आते थे।
वह कहते हैं – “मेरे पास जो किस्में हैं, उनमें से लगभग 40% किस्में मैंने किसानों से इकठ्ठा की हैं। लगभग 25 किस्में अदला-बदली के माध्यम से प्राप्त की हैं।”
अब उनके पास 1,100 किस्मों के बीज हैं, जिनमें से लगभग 1,000 किस्मों के धान, कुछ किस्मों की सब्जियां, साग, दालें और तिलहन शामिल हैं।
इसके अलावा, उन्होंने फिलीपींस में IRRI मुख्यालय से धान की 34 किस्में प्राप्त कीं, जो कैल्शियम, जिंक, आयरन, प्रोटीन और एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर हैं और यहां तक कि कुछ कैंसर-रोधक गुणों वाली भी हैं।
उन्होंने धान के बीजों को काले चावल, भूरे चावल, औषधीय किस्म के चावल, अधिक उपज देने वाली किस्म और बारीक चावल के रूप में वर्गीकृत किया है।
साहू ने धान की छह नई किस्में क्रॉस-अंकुरण के माध्यम से बनाई हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि ये औषधीय महत्व की हैं, सूखा-रोधी हैं और बेहतर उपज प्रदान करती हैं।
साहू कहते हैं – “मेरा बीज बैंक दो उद्देश्यों की पूर्ती करता है। यह किसानों के लिए व्यापक विकल्प प्रदान करता है और सदियों पुराने स्वदेशी बीजों को संरक्षित करने में मदद करता है।”
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जहां साहू की 5 एकड़ जमीन का आधा हिस्सा उनके परिवार के लिए फसल उगाने के लिए रहता है, वहीं एक एकड़ में फसल पैदा की जाती है, ताकि बीजों को संरक्षित किया जा सके। बाकी जमीन में सालाना रोटेशन के आधार पर वह ज्यादा से ज्यादा उन छह देशी किस्मों की खेती करता है, जिनकी मांग होती है।
अपने स्थानीय बीज संरक्षण कार्य के लिए, साहू पारम्परिक तरीकों का पालन करते हुए मिट्टी के बर्तनों में बीज जमा करते हैं।
वह प्रत्येक घड़े के चारों और गाय के गोबर और हल्दी के लेप से घेरा बनाते हैं, धूप में सुखाते हैं और फिर बीज को घड़े में रखते हैं। कीट-पतंगों को दूर रखने के लिए, वह बीजों को नीम के पत्तों से ढक देते हैं।
संरक्षण और लेबल लगाने के समय लेने वाले कामों में उनकी पत्नी, शांतिलता उनकी मदद करती हैं।
समय-समय पर वह बीजों की जांच करते हैं कि कहीं वे खराब तो नहीं हो गए हैं।
साहू को जुनून है कि जैविक खेती किसानों को एक ज्यादा टिकाऊ जीवन प्रदान करने में मदद कर सके, जिससे उनका अप्रत्याशित आपदाओं से बचाव हो, जो फसलों, आजीविका और जीवन को नष्ट कर देती हैं।
एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, 2013 और 2018 के बीच ओडिशा में 227 किसानों ने आत्महत्या की थी, जिनमें से ज्यादातर साहू के गृह जिले बारगढ़ से थे। इसका कारण बेमौसम बारिश, कीटों के हमले से फसल का नुकसान और कर्ज का बोझ था।
साहू कहते हैं – “ये किसान आत्महत्याएं मुझे बहुत परेशान करती हैं। इसलिए उन्हें रोकने में मदद करने के लिए, मैं किसानों को जैविक और टिकाऊ खेती में प्रशिक्षित करता हूँ। मैं हर साल 100 से ज्यादा प्रशिक्षण सत्र आयोजित करता हूं।”
किसानों की मदद करने और देशी बीजों के प्रचार-प्रसार के लिए, उन्होंने 1,200 से ज्यादा किसानों के साथ मिलकर ‘देसी बिहान सुरक्षा समिति’ की स्थापना की। उनमें से लगभग 250 किसान 22 देशी किस्मों को सफलतापूर्वक उगाते हैं। क्योंकि बीजों की मांग है, इसलिए वे साहू के पास पहले से बीज बुक कर लेते हैं।
साहू अपने क्षेत्र के किसानों को बेहद पौष्टिक काले चावल उगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिसकी उनके पास 14 किस्में हैं।
यह चावल लोकप्रिय है और बीरेंद्र प्रधान जैसे कई स्थानीय किसान फसल से अच्छी आय प्राप्त कर रहे हैं।
उन्होंने कहा – “सारा श्रेय सुदाम साहू को जाता है। उन्होंने मुझे काले चावल उगाने के लिए प्रेरित किया।”
जहां एक किसान को आम तौर पर 1,800 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है, वहीं साहू और उनके अनुयाईयों को 4,000 रुपये प्रति क्विंटल मिलते हैं।
साहू मजबूती से कहते हैं – “किसान लाभ कमा सकते हैं। लेकिन उनकी आय तभी दोगुनी होगी, जब वे जैविक खेती की ओर बढ़ेंगे। मेरा सपना कर्ज-मुक्त, आत्मनिर्भर किसानों को कीटनाशक मुक्त भोजन का उत्पादन करते देखना है।”
शारदा लहंगीर भुवनेश्वर स्थित पत्रकार हैं, जो विकास, संघर्ष, जेंडर, स्वास्थ्य और शिक्षा के बारे में लिखती हैं।
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